गुरुवार, 3 सितंबर 2009

कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए

बीकानेर संभाग ने दुधवाखारा से लेकर अनेक आंदोलन आजादी के लिए किए। आजादी के बाद अपने रूप को संवारने और तकदीर बनाने के लिए भी यहां संघर्ष हुए। उन संघर्षों में कम ही ऐसे उदाहरण हैं जिनमें सफलता नहीं मिली। कहीं मांग पूरी हुई और वैभूति का रास्ता खुला तो कहीं आंदोलन ने नया नेता दिया जो शहर-गांव की धड़कन बना। इस संभाग के अनेक नेता संघर्षों की देन हैं जिन्होंने आम आदमी की लड़ाई विधायक या सांसद बनने के बाद लड़ी। आजादी के 62 साल बाद भी बीकानेर फिर संघर्ष की राह पर है। अपने हक के लिए उसे सड़क पर आना पड़ा है। राजनीति के सहारे पाने की आकांक्षा समाप्त हो गई तो वकील और आम जन मैदान में उतरे हैं। जोधपुर हाइकोर्ट में ज्यादा मुकदमे बीकानेर संभाग के हैं तो यहां के वकीलों ने हाइकोर्ट की बेंच बीकानेर में खोलने की मांग को लेकर जन संघर्ष शुरू किया है। अपनी अस्मिता के लिए लड़ाई छेड़ी है जिसमें जन हित का मकसद साफ दिखता है। इसी तरह बीकानेर में केन्द्रीय विवि को लेकर सब एक मंच पर हैं, थोड़ी राजनीति भले ही हो। यदि केन्द्रीय विवि यहां बनता है तो संभाग को लाभ मिलेगा। एक मकसद है, अस्मिता का विकास का, इसलिए इस संघर्ष में भी जन हित साफ परिलक्षित होता है। मकसद के लिए किया जाने वाले संघर्ष न तो बेमानी होता है और न ही उसके असफल होने की कोई संभावना रहती है। इन दोनों आंदोलनों को यदि राज ने गंभीरता से नहीं लिया तो उसके सामने समस्या खड़ी हो जाएगी, भले ही वो राजनीतिक ही क्यों न हो। सत्ता का विकेन्द्रीकरण लोकतंत्र की मूल भावना है उसकी अनुपालना न हो और उसके खिलाफ संघर्ष किया जाए तो वो सही ही होता है। बीकानेर संभाग के वकील अपने लाभ के लिए नहीं लड़ रहे, जनता का हित इसमें प्रमुख है। पेशी के लिए जाने पर धन फरियादी का लगता है, वकील का नहीं। अपने फरियादी के हक के साथ उसके भले के लिए लड़ रहे वकीलों ने आम जन की सहानुभूति व सहयोग पाया है। अपने व्यवसाय को रोक वे अस्मिता, वजूद और जनहित की लड़ाई लड़ रहे हैं इसीलिए समाज का हर तबका उनके पीछे खड़ा हो रहा है। इन दो अस्मिता वाले मुद्दों पर अब संभाग की जनता साफ निर्णय चाहती है, आश्वासन नहीं। ऐसी साफगोई वाली लड़ाई कभी असफल नहीं होती। अलमस्त शहर अब हक के लिए खड़ा हो गया है। उसका भाव स्व-दुष्यंत की इन पंक्तियों की तरह है-
ये सच है कि पांवों ने बहुत कष्ट उठाए,
पर पांव किसी तरह राहों पर तो आए,
हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।

गुरुओं ने झुका लिया है मंत्री को

समानीकरण के नाम से शिक्षकों को डराने का काम एक महीने से चल रहा था। पहले शिक्षक घबराए फिर मिमयाये और अब गुर्राए। समानीकरण के आदेशों की होली जला जहां शिक्षकों ने विभाग के निर्णय को खुली चुनौती दी है वहीं हाइकोर्ट में जाकर न्यायिक पक्ष भी सामने लाए हैं। जोधपुर में वकीलों की हड़ताल है मगर समानीकरण ने शिक्षकों के वजूद को ललकारा है इसलिए वकील के बिना ही वे माननीय न्यायाधीश के सामने पेश हो गए और नोटिस जारी करा दिए। गुरुजनों की इतनी हलचल विभाग के अधिकारियों और मंत्रीजी को हिलाने के लिए काफी थी। आनन-फानन में पहले पातेय वेतन पदोन्नति से पद भरने का निर्णय हो गया। जाहिर है समानीकरण एक बार तो टल ही गया। यहां भी वही बात है, मकसद के लिए किया गया संघर्ष बेमानी थोड़े ही गया।

2 टिप्‍पणियां:

  1. अगर तासीर बताने से मालूम हो जाती, तो फिर क्या बात थी।
    ( Treasurer-S. T. )

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  2. bikaaner waasiyon ke aandolan bilkul sahi hain.
    bknr main high court or kendriya vidhyaalaya jaroor khulne chaahiye.
    in dono par bknr kaa puraa hak hain.
    thanks.
    CHANDER KUMAR SONI,
    L-5, MODEL TOWN, N.H.-15,
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