गुरुवार, 27 अगस्त 2009

आइये आंखें मूंद लें ये नजारे अजीब हैं...

बीकानेर के सभी 927 गांवों में अकाल है, अब तो सरकार ने भी मान लिया। खेत में फसल नहीं, खेळी में पानी नहीं, बल्ब में बिजली नहीं, नहर में रेत, हाथ में काम नहीं। इस बात को राज ने भी स्वीकार लिया और जिला अभावग्रस्त घोषित हो गया। चार माह से गांवों के लोग शोर मचा रहे हैं कि नहर में पानी नहीं मिलने से उनकी फसलें चौपट हो गई और बिजली नहीं मिलने से कुओं से पानी बाहर ही नहीं निकला। बिजली की मांग को लेकर जीएसएस से सब स्टेशन तक कब्जा कर विरोध जताया मगर समस्या हल करने के बजाय विरोध के पाळ बांधी गई। मूंगफली की फसल बर्बाद हो गई, बची फसल को पानी मिलता तो चारा हो जाता। बहस, आदेश व निर्देश के बाद तय हुआ कि अकाल है, गांव की आवाज पहले ही सुन ली जाती। अब तक तो केवल अकाल तय हुआ है उसके लिए राहत की बरसात होनी बाकी है। पता नहीं उसमें कितना समय लगेगा। तब तक इससे प्रभावित लोगों की सुध कौन लेगा, इसका जवाब मांगने पर भी नहीं मिलता। नरेगा हाथ में है तो उससे राहत तो दी ही जा सकती है। इंदिरा नहर से जुड़ी जमीनों के प्यासे रहने का मामला पेचीदा है ही इस बार तो बारानी की प्यास भी मानसून ने नहीं बुझाई। किसान को सरकार ने ब्याज माफी का तोहफा तो दिया मगर उसके सामने मूल किस्तें भरने का भी संकट है। काम की तलाश में गांव से लोग शहर की तरफ आए मगर यंहा भी बिजली ने बेबस किया हुआ है।
जन प्रतिनिधि इस मसले पर बोले हैं मगर सीमित दायरे में। अभी अकाल की घोषणा हुई है, फिर निर्णय होगा, सरकारी मुहर लगेगी और अकाल राहत कार्यों को शुरू करने का आदेश राज से काज को मिलेगा। उसके बाद ग्रास रूट पर राहत देने का काम आरंभ होगा। हर किसी को लगता है कि तब तक बहुत देर हो जाएगी। समय को जीतना ही शायद अकाल पर विजय का मूल मंत्र है, यहां तो समय से मुकाबला करने की पहल की प्रतीक्षा है। बंजर जमीन व प्यासे पशु देखकर किसान का मन विचलित हो रहा है। उसे दिलासा कैसे मिले क्योंकि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है। अभी तो हालात स्व. दुष्यंत के शेर की तरह है-
वो निगाहें सलीब है हम बहुत बदनसीब
है, आइये आंखें मूंद लें ये नजारे अजीब है

नहर एक पर निगाहें दो
इंदिरा नहर कहने को तो एक है पर उसके दो चरण है इसीलिए शायद दो निगाहें भी बन गई हैं। इस नहर को मिलने वाले पानी का 60 फीसदी पहले चरण को मिलना चाहिए और शेष 40 फीसदी दूसरे चरण को जिसमें बीकानेर आता है। नहर में पानी की कमी है और उस पर भी निगाहें न्याय नहीं कर रही। किसान बताते हैं और आंकड़े भी बोलते हैं, दूसरे चरण को पानी कम मिल रहा है। राज को सोचना चाहिए यदि इस निगाहों के फर्क को किसान ने पहचान तेवर बदल लिए तो हालात भी बदलते देर नहीं लगेगी। अकाल के इस दौर में किसान हर तरफ से थपेड़े झेल रहा है। इस पानी के मुद्दे पर यदि पलटवार कर दिया तो लेने के देने पड़ जाएंगे।

1 टिप्पणी:

  1. namaste ji,
    main aapki baat se bilkul sehmat hoon. lekin, mera maananaa hain ki-"saari duniya vishvas par hi tiki huyi hain. saari duniya vishvas se hi chalti hain."
    aap vishvas nahi to bharosa jaroor rakhiye ki-"aakaal ki ghoshnaa ho gayi hain. raahat ki barsaat bhi jald hi hogi."
    thanks.
    CHANDER KUMAR SONI,
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