शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर....

शांत व शालीन शहर के बाशिंदे इन दिनों तीखे तेवर लिए हुए हैं। हाईकोर्ट की बेंच चाहने की उनकी ललक एकजुट होकर बीकानेर बंद करने में सामने आई है। बिजली के मामले में अब धैर्य टूट गया है इसलिए फ़िर से जीएसएस पर घेराव-प्रदर्शन का बोलबाला है। नगर निगम व नगर विकास न्यास में चल रही आर्थिक तंगी के कारण विकास के सारे काम ठप है जिस पर भी नगरवासी आक्रोशित हैं। केन्द्रीय वि वि की बात सरकार ने एकबार बंद कर दी क्योंकि इसे भी बीकानेर ने अपनी अस्मिता से जोड़ लिया है। मांगने से बचने वाले शहर की अस्मिता पर इतने प्रहार हुए कि अब हर बात पर लोग रिएक्ट करने लगे हैं इन सभी इच्छाओं की पूर्ति के लिए जो के लिए जो आन्दोलन चल रहे हैं उनमें आश्चर्यजनक रूप से राजनीति पीछे है और समाज के बाकि तबके आगे। मंगलवार को बीकानेर बंद इसका प्रमाण है। राजनितिक चेहरों की बजाय वकील, छात्र, व्यापारी सड़क पर थे। दूकानदारों ने अपनी दुकाने खोली ही नही इसलिए बंद के लिए किसी को कहना नही पड़ा। अरसे बाद ऐसा बंद बीकानेर में हुआ। इससे सरकार व नीति निर्धारकों को समझ लेना चाहिए कि हाईकोर्ट की बेंच को लेकर यह संभाग कितना गंभीर है। बंद और वह भी शांतिपूर्ण, इस बात का प्रमाण है कि कम में समझोता नही होगा। वही जनता है जो शिक्षा विभाग तोड़ने पर खामोश रही, रंगमंच अधूरा छोड़ने पर भी आक्रोशित नही हुई और रोजाना मानव श्रम व आर्थिक हानि के बाद भी शहर के बीचोबीच अड़े रेलवे फाटकों को सहन कर रही है। विकास के काम में अपना योगदान देने में भी कोताही नही बरतती मगर अब लोहे जैसे दिलवालों को अपनी अस्मिता पर और प्रहार सहन नही। वे आरपार के मूड में हैं इसीलिए जन आंदोलनों में भी भागीदारी बढ़ गई है। कबीर ने कहा भी है-
कबीरा लोहा एक है गढ़ने में है फेर, ताहि का बख्तर बने ताहि की शमशेर

अस्पताल फ़िर हड़ताल पर
रेजीडेंट डॉक्टरों ने फ़िर अपनी मांगों को लेकर हड़ताल कर दी। परिणाम वे ही हैं जो हर बार होते हैं। ऑपरेशन कम हो गए हैं। मरीजों को देखने का काम वरिष्ठ चिकित्सक कर रहे हैं इसलिए निजी अस्पतालों की और रुख हो गया है। पहले भी कहा था, मांगे और हड़ताल सही हो सकती है मगर आम आदमी को इससे तकलीफ क्यों? उसने क्या बिगाड़ा? मामला सरकार व रेजीडेंट डॉक्टरों के बीच का है मगर सफर तो मरीज करते हैं। क्या ऐसा कोई रास्ता नही निकल सकता जिसमे मरीजों को परेशानी न हो। गाँव से आई रामली को इलाज के लिए किस तरह तरसना पड़ा उससे लोग बेखबर क्यों हैं? उसे तो डॉक्टरों की अलग-अलग रेंक का भी पता नही, उसे हड़ताल की सज़ा क्यों मिले? न सरकार अड़े, न डॉक्टर इस हद तक जाएँ, कोई तो रास्ता निकालिए।

शांतता! तबादला चालू आहे
शिक्षा विभाग में इन दिनों स्कूलों की तरफ़ किसी का ध्यान नही है। शिक्षा निदेशक से लेकर बीईईओ तक तबादलों के कागजात तैयार करने में लगे हैं। ज़ाहिर है तबादले का शिकार शिक्षक होने है इसलिए वे भी इस वार से बचने की कोशिश में हैं। शिक्षक स्कूल में अनमने रहते हैं तो उसका निरिक्षण करने वालों को तबादले का काम करने से ही फुरसत नही है। क्या संदेश जा रहा है विद्यार्थियों में, पातेय वेतन पदौन्नति, तबादले, शिक्षण व्यवस्था आदि में ही पूरा विभाग लगा है तो सरकारी स्कूलों की साख तो गिरेगी ही। फ़िर कहते हैं कि बच्चे निजी स्कूलों की तरफ़ जा रहे हैं। शिक्षा का यह हाल अब आम लोगों को अखरने लगा है, इसे राज ने नहीं पहचाना तो परिणाम गंभीर निकलने तय हैं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य जी आपने तीनो मुद्दे बहुत महत्व पूर्ण उठाये हैं कहीं न कहीं जनता ,वयवस्था व राजनेतिक स्वार्थों का तालमेल इस कदर बिगडा है की सिवाय सहने के कोई उपाय नजर नहीं आता.

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