बुधवार, 8 जुलाई 2009

तिनका कबहुं ना निंदिये जो पांव तले होय...

बीकाणे ने हिलमिल हासिल किया एक और विश्वविद्यालय
रियासतों के विलिनीकरण के समय यहां के शासकों ने बीकानेर को शिक्षा की राजधानी बनाने का वादा लिया था। लोकशाही ने उसे आधा-अधूरा ही पूरा किया, कई बार तो कमजोर करने के निर्णय भी लिए। गहरे पानी की पैठ वाले यहां के लोगों ने सहन कर लिया मगर अब यहां के लोगों को राज-काज की छेड़खानी अखरने लगी है। वे हिलमिल गए हैं और अपनी बात को तीखे तेवर के साथ रख रहे हैं। केन्द्रीय विवि की सिफारिश यहां के हिलमिलने का परिणाम रहा। वेटेरनरी विवि की मांग भी यहां के राजनेताओं, वैज्ञानिकों, व्यापारियों, सामाजिक क्षेत्र के लोगों ने सामूहिक रूप से की थी जिसका ख्याल गए राज ने नहीं रखा मगर इस राज ने आज उसकी घोषणा कर दी। यदि घोषणा आज नहीं होती तो शायद बीकानेर संभाग की रंगत कुछ और ही होती जो राज-काज की आंखें खोल देती। खैर, यह सौगात बीकानेर को पसंद आई है क्योंकि यहां ग्रामीण क्षेत्र में पशुपालन बड़ा व्यवसाय है। शहर में पशु सेवा बड़ा धर्म है। व्यवसाय व धर्म की रक्षा हुई तो बीकाण हर्षाया भी है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री पिछले दिनों बीकानेर आए तो लोगों ने अपने गुब्बार निकाले। पीबीएम की साख पूरे उत्तर भारत में है इसलिए यहां की स्वास्थ्य अपेक्षाएं भी काफी है। कैंसर के लिए न सही मगर बजट में ह्रदय रोग विभाग के लिए घोषणा हुई वह भी रास आई है। हालांकि थोड़ा हुआ पर अभी आगे के लिए ज्यादा की गुंजाइश है, यह संकेत तो बीकाणे ने दे दिए हैं। भाजपा नेताओं से मिलने पर यहां के जो लोग स्वास्थ्य मंत्री से थोड़े नाखुश हुए थे उनकी तल्खी बजट घोषणा के बाद कुछ कम हुई है। अभिलेखागार के लिए 1.13 करोड़ की सौगात भी इतिहास को सहेजने की दृष्टि से सुखद है। ले-देकर राज्य स्तरीय कुछ ही कार्यालय तो बीकानेर में है।हां, कुछ नहीं मिला उसके लिए मलाल जताने में भी यहां के लोग कंजूस नहीं है। बीकानेर विवि के विकास के लिए कुछ न होना, रेल बाइ पास, लिंक रोड, डेयरी व फूड साइंस कॉलेज, आठवीं बोर्ड जैसे विषय अछूते रहने से लोग नाराज भी हैं। आर्थिक मंदी की चपेट में आकर अस्तित्व खो रहे बीकानेर के ऊन उद्योग को राहत नहीं मिलना और दाल पर कर की दर की विसंगति को बजट के माध्यम से दूर नहीं करना भी सालता है। ये सब बीकानेर के हक हैं जिनको हासिल करना यहां के लोगों का लक्ष्य है। ऐसा हर किसी को समझना चाहिए नहीं तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। अपेक्षाओं का सागर व्यापक है उसमें जितना पानी डाला जाए कम है, बीकानेर तो वैसे भी रेगिस्तानी इलाका है इसलिए यहां पानी की अधिक आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पहचान करने वाला राज और काज ही संवेदनशील माना जाएगा, यही संकेत यहां की हिलमिल राजनीति के हैं। कबीर ने कहा भी है- तिनका कबहुं ना निंदिये जो पांव तले होय, कबहुं उड़ आंखों पड़े पीर घनेरी होय।

1 टिप्पणी:

  1. अच्छा विश्लेषण.

    नया शब्द सीखा: हिलमिल राजनीति :)

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