शुक्रवार, 5 मार्च 2010

हालात ए जहां और भी खराब...
प्रशासन शहरों की ओर क्या गया जैसे किसी ने बरसों से बने घाव को छेड़ दिया। यह शहर तंग गलियों में तंग साधनों के बीच जीने का आदी हो गया है क्योंकि यहां बसने वालों का दिल तंग नहीं है। कहने को तो सभी समस्याओं के मौके पर निदान का नारा लेकर सभी सरकारी महकमे लोगों के बीच गए हैं मगर हर शिविर की समाप्ति पर उसका तलपट देखा जाए तो नतीजा सिफर ही मिलता है। वर्षों से जिन समस्याओं के बीच लोग रहते आए हैं यदि उनको दूर करने का माद्दा नहीं है तो झूठी दिलासा देकर उनको बेदर्दी याद क्यूं दिलाई जाती है। न नियमन होता है न किसी नये निर्माण की स्वीकृति, फिर काहे का शिविर। लोग आते हैं आस से पर जाते हैं तो उनके पास निराशा के अलावा कुछ नहीं होता।
विरोध करने वाले भी अपना धर्म निभाते हैं वे भी विरोध के नारे लगा चले जाते हैं। दोनों तरफ से रस्म अदायगी हो रही है। हर जिले से मिल रही खबरों से यही लगता है कि सभी जगह एक ही ढर्रा है। पता नहीं इस तरह की दशा होने के बाद भी सरकार या उसके अधिकारी अपनी समीक्षा क्यूं नहीं करते। उनके जेहन में केवल कागजों में शिविर लगा देने की बात ही क्यूं है। आम आदमी या उसकी समस्याएं क्यूं नहीं है। बीकानेर की दशा तो इस मायने में बहुत ही खराब है। शिविर में आला अफसर तो जाना मुनासिब ही नहीं समझते जबकि सरकार के सामने कागजों में सफलता दिखा वाहवाही लूटने का काम करने से नहीं चूकते। अनेक बार हालात बिगड़े हैं और जनता व विभाग के कर्मचारी आमने-सामने हुए हैं इसके बाद भी शिविरों की गंभीरता को नहीं समझा गया है। यदि समस्याओं की फेहरिस्त वार्डवार बनाई जाए तो महकमों को एक साल का काम मिल जाएगा। लेकिन इतनी जहमत जब बड़े अधिकारी ही नहीं उठाते तो दूसरा क्यों ध्यान दे। प्रशासन शहरों के संग का अभियान कागजी ही बनाने की यदि सरकारी महकमों की मंशा थी तो उन्हें नाटक के मंच बनाने की भी क्या जरूरत थी। मंच बनाने में भी तो जनता का ही धन जाया होता है। अब भी देर नहीं हुई है, शिविरों की गंभीरता की समीक्षा होनी चाहिए। यदि यह काम सरकारी महकमे नहीं करते हैं तो जन प्रतिनिधियों को तो पहल कर एक निर्णय तक पहुंचना चाहिए। उनका भी पहला ध्येय पब्लिक ही है, उसे यूं अकेले छोडऩा सही तो नहीं है।
फिर दिखा शहर एक
मरहूम शायर अजीज आजाद ने कहा है- मेरा दावा है सारा जहर उतर जाएगा, दो दिन मेरे शहर में ठहर कर तो देखो। इसी तरह दिवंगत कवि मोहम्मद सदीक ने भी लिखा- आपको सलाम मेरा सबको राम राम, रे अब तो बोल आदमी का आदमी है नाम। इस बार ईद मिलादुन्नबी और होली की समीपता ने फिर दिखाया कि यहां का बाशिंदा अपनी परंपरा और संस्कृति को नहीं भूला है। उस पर नाज करता है और मौका मिलने पर उसका इजहार भी करने से नहीं चूकता। दोनों त्योहारों पर दिखा सोहार्द्र व जोश कहने को मजबूर करता है कि शहर एक है।
जाना मखमूर सईदी का
उर्दू अदब का बड़ा नाम है मखमूर सईदी। बीकानेर के अनेक मुशायरों और कवि सम्मेलनों में वे आए और अपने उर्दू अदब से उन्होंने प्रभावित किया। उनके शेर व गजलें जीवन के गहरे अनुभवों से दो-चार कराते हैं। बीकानेर में उर्दू शायरी का माहौल है जिसने इस शायर को पूरा मान दिया। उनका जाना एक बड़ी दुर्घटना है। उर्दू शायरी की बड़ी क्षति है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. Resp. Madhuji,
    namaskar, aapane administration ki dukhati rag par haath rakh diya, agar in shiviron me kaam hone lag jayega to phir in logo ki jo kamaai hoti he wo kahan se aayegi,therefore it is foolish to expect from such events any meaningful results as there will be no commission or kickbacks to these people. with regards, Triloki kalla

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