गुरुवार, 7 जनवरी 2010

उनकी खता भी तुम्हारी नजर में खता नहीं...
एक बार फिर बीकानेर संभाग अपना हक पाने से वंचित रहेगा यह तय लगता है। व्यास समिति ने बीकानेर में केन्द्रीय विवि खोलने की सिफारिश की थी मगर उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। इसी समिति ने जोधपुर में आईआईटी व उदयपुर में आईआईएम की सिफारिश की जिसे मान लिया गया। आश्चर्य है पद्म भूषण से सम्मानित अर्थशास्त्री की आधी सिफारिशें सही और आधी नहीं, किस पैमाने से उसको नापा गया। आदमी आधा सही और आधा गलत हो, यह कैसे संभव है। जाहिर है बात दूसरी है, खता कोई और है जिसकी सजा इस संभाग को मिल गई। राजनीतिक हैसियत और ताकत के बूते पर यदि शिक्षण संस्थान खोलने का निर्णय होता है तो फिर समितियां, सर्वे, आश्वासन जैसे अधूरे नाटक क्यूं खेले जाते हैं। भावनाओं और संवेदनाओं का मजाक क्यों बनाया जाता है। इस संभाग के लोगों के मन में व्यास समिति के जरिये एक भाव पैदा किया जिसने दलीय व जातीय सीमाएं तोड़कर सबके मनों को मिला दिया। उसके बाद भी बिना खता सजा देने की बात क्यूं हुई। क्या इस दर्द का कोई मरहम है, इस घाव का निशान कोई मिटा सकता है क्या। सत्ता के पैरोकार क्या आजादी के 62 साल बाद भी संकीर्ण क्षेत्रवाद की राजनीति के चक्रव्यूह में रहकर ही विकास के निर्णय करेंगे, यह यक्ष प्रश्न है। यदि इसका जवाब सत्ता के बाजीगरों ने नहीं दिया तो यहां के लोग उनको वक्त आने पर बिना खता की मिली सजा को याद दिलाने से नहीं चूकेंगे। समय का पहिया कभी स्थिर नहीं रहता, उसे तो ऊपर-नीचे होना ही पड़ता है। संभाग के लोगों के मन में एक दावानल है, सब्र का प्याला छलकने को तैयार है। समय आने पर शायद संवेदना अपनी अभिव्यक्ति देने में भी कोताही नहीं बरतेगी। केन्द्रीय विवि का सवाल इस संभाग की अस्मिता से जुड़ गया था, यह जानकर भी अन्जान बनने वाले पता नहीं किस गफलत में है। यहां के लोग गहराई से निकला पानी पीते हैं इसलिए शालीनता की परिधि में रहकर वो जवाब देते हैं, उनके चेहरों के भावों से इस बात का अंदाजा होता है कि इस सजा को वे खुद को दी गई चुनौती मान रहे हैं। अपनी सामर्थ्य से चुनौतियों का जवाब देना हर इंसान को आता है फिर ये तो पूरे संभाग के बाशिंदों की बात है। शायर नदीम की बात में जहां शराफत है वहां चुनौती का जवाब देने का जज्बा भी है-
रम्ज़ तुम्हारी भी नहीं समझा हूं मेरे दोस्त- फेंकते हो पत्थर शीशे के घर में रहते हो, उनकी खता भी तुम्हारी नजर में खता नहीं-मेरी मजबूरियों पर भी तुम सजा देते हो।
गरीब की रोटी का सवाल
एक बार फिर सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने गरीब की रोटी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आटे-दाल के वितरण के लिए डिपो थे और उसको पाने के लिए राशन कार्ड। महंगाई ने गरीब की थाली में सामान कम तो किया ही मगर उसको पाने के लिए भी लालायित कर दिया। राज्य में पहली बार दाल-आटा डेयरी के बूथों के जरिये बांटा जा रहा है जिन पर न तो रसद विभाग का नियंत्रण है न उपभोक्ता का। यदि खुले बाजार की प्रक्रिया को अपनाना ही है तो दो छोर क्यूं, राशन की दुकानें बनाए रखने का क्या औचित्य। उनके जरिये भी तो आम उपभोक्ता तक रसद का वितरण किया जा सकता है। यदि वे नाकारा हैं तो उनको इतने दिनों तक चलने क्यूं दिया गया। रसद विभाग की दोहरी नीति ने चीजों की उपलब्धता को मुश्किल किया है पर साथ ही कालाबाजारी के कई रास्ते भी खोले हैं। एक बार फिर सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर विचार की जरूरत हो गई है। यदि खुले बाजार को अपनाया गया तो चीजों के दाम बढ़ेंगे और कालाबाजारियों को मुनाफा होगा, इस हालत में गरीब को तो सस्ता रसद नहीं मिलेगा। यदि सच स्वीकारें तो पिछले पांच साल में घर-घर में गैस कनेक्शन हो गया फिर भी घरेलू केरोसिन की मात्रा बढ़ी है। कोई सोचता है कि इतनी खपत कैसे, कहां होती है। जाहिर है इसके लिए काला बाजार ही पनाहगाह है। उसे रोककर वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने की कोशिश क्यों नहीं होती। जानकारों का मानना है कि उपभोक्ता की जगह जब मुनाफे और बाजार को केन्द्र में रखा जाएगा तो यही परिणाम सामने आएंगे। हालात विकट हैं यदि इनकी आहट राज और काज ने नहीं सुनी तो आने वाला समय उनको कई बड़ी चुनौतियां देगा।

3 टिप्‍पणियां:

  1. भ्रष्टाचार का बोलबाला है.... लेकिन अपने छुटभईए के लिए यह व्यवस्था चल रही है.....राशन कार्डधारक तो बहुत हैं लेकिन कितनों को मिलता है राशन.......कोई हिसाब किताब नही है....कोई अंकुश नही.....ऐसे मे क्या उम्मीद करे कोई...

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  2. sahi likha hai, kalabajair karne walo ko sarkar aur rasad vibhag ki galat nitiyo se mouka mil raha hai.
    .....kirti rana/blog pachmel

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  3. jantaa ki thaali main chhed kar rahi hain sarkaar. gareeb aadmi waise bhi ek time khaanaa khaataa hain, wo bhi raashan se lekar.
    ab sarkaar us ek waqt ki roti bhi gareeb se chheen rahi hain. gareeb ki haay lagegi, aisi thaali-chhedan sarkaar ko.

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