बुधवार, 2 जून 2010

इस तरफ आती तो हम भी देखते फसले-बहार...
बिजली और पानी, पता नहीं इनको गर्मी में ही क्या होता है। हर बार ऐसा होता है और हर बार इसकी मार सहनी पड़ती है। ऐसा भी नहीं है कि गर्मी में इन दोनों की कमी का राज या काज को पता न हो पर सिवाय सहन करने की दुहाई देने के कुछ भी जतन नहीं होता। पहले जहां शान से हर गांव-ढाणी तक बिजली पहुंचाने की बात मुख्य खबर होती थी वहीं अब कितने घंटे बिजली बंद रहेगी यह मुख्य खबर होती है। करीने से टाइम तय होता है और आजादी के इतने सालों के बाद भी घोषणा की जाती है कि दो से छह घंटे तक क्षेत्रवार बिजली बंद की जाएगी। यह तो होती है घोषणा, बिना घोषणा जो जबरदस्ती होती है वह अलग। बीकानेर तो हर गर्मी में इसका शिकार होता है। यहां के बाशिंदों की मासूमियत तो देखिये, ये नहीं कहते कि बिजली नहीं काटी जाए अपितु यह कहते हैं कि बिजली सुबह काटी जाए। दमदार आवाज में कटौती के खिलाफ आवाज बुलंद भी नहीं करते। ऐसे दयावानों की हालत को सुधारने की जेहमत भी नहीं उठाई जाती।
गांवों की हालत तो और भी खराब है। वहां तो पूरे दिन बिजली रूठे भगवान की तरह दर्शन ही नहीं देती। ग्रामीणों की आवाज भी नहीं सुनी जाती। कारखानों के चक्के जाम हो तो हों, व्यापारी का व्यापार बंद हो तो हो। बिजली तो काटी ही जाएगी। बिजली आम आदमी की तो बैरन बनी हुई है। उसे तो अपने फाल्ट ठीक कराने में भी पसीना आ जाता है। समाज का शायद ही कोई ऐसा वर्ग होगा जो बिजली की इस बदइंतजामी से बेहाल न हो। अब तो पूरा जीवन भौतिक युग में बिजली केन्द्रित हो गया है उसमें तो सब कुछ बदहाल होना ही है। व्यापारी, उद्यमी, किसान, आम आदमी, मरीज, कर्मचारी हर कोई हर गर्मी में बिजली के कारण परेशान होते हैं। कभी भी इस शाश्वत समस्या के समाधान पर ठोस प्रयास होता दिखता नहीं। केवल लाचारी व मजबूरी बताकर जनता को सहने के लिए ही मार्मिक निवेदन किया जाता है। राज तो कई आए और गए पर इस बैरन बिजली से जनता का पिंड किसी ने नहीं छुड़ाया। जनता की बेबसी पर स्व. दुष्यंत का शेर याद आता है-
रोज अखबारों में पढ़कर यह ख्याल आया हमें, इस तरफ आती तो हम भी देखते फसले-बहार, मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं, बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार।
जल बिन नहीं है कल
बिजली के बाद सबसे ज्यादा बीकानेर में हालात खराब हैं तो वो पानी के हैं। गांवों की बात तो करना ही बेमानी है जब शहर में ही पेयजल के लिए लाले पड़ते हों। बिजली व बदइंतजामी के कारण जल उत्पादन कम होता है तो जाहिर है उसकी आपूर्ति भी कम ही होती है। गांवों में तो जल संग्रहण को लेकर इतने वर्षों में भी कोई नीति नहीं बनी। डिग्गियां बना तो दी गई मगर उनकी सफाई और भराई की याद गर्मी आने पर आती है। नहरों में पानी तो चलता हैै, पर उतना नहीं चलता है, उस पर तो पंजाब से पानी न मिलने की दुहाई दे दी जाती है। नहरों के किनारे वाटर पाइंट बनाए गए पर वे जल विहीन ही रहते हैं। हालत यह है कि निजी तौर पर पानी खरीदना पड़ता है जिसके दाम भी सुरसा की तरह बढ़े हैं। 100 रुपए में मिलने वाला टैंकर गांवों में कई बार तो अब 1000 तक में लेना पड़ता है। पानी और बिजली की बदइंतजामी हर गर्मी में क्यूं होती है, क्या यह सवाल राज के मन में नहीं आता। जिनके जिम्मे यह काम है उनकी जवाबदेही तय क्यूं नहीं की जाती। यदि उनकी आवश्यकताएं हैं तो उनकी पूर्ति क्यूं नही की जाती। यदि यही हालात रहे तो जल के बिना कल गर्म हो जाएगा। जिस पर लगाम लगाना फिर मुश्किल हो जाएगा। अभी तो मौसम की शुरुआत हुई है, बात संभाली जा सकती है। ध्यान नहीं दिया तो आने वाला समय राज और काज का चैन छीन लेगा।

1 टिप्पणी:

  1. bijli aur pani rajasthan he nahi apitu purey bharat main ek vikral samsaya hai jiskey samadhan hetu sarkar he nahi aam janta ko bhi jagruk hona hoga janranjan padh ker accha lagta hai bhasker ke jal hai to kal hai
    abhiyan ke liye dhanyavaad

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